वन्देमातरम जय हिन्द

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गुरुवार, 23 जून 2011

जाग तुझको दूर जाना !



चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!


बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!


वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया!
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियां बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!
प्रस्तुत कविता महादेवी वर्मा द्वारा रचित है . ये कविता मैंने अपने  स्कूल के दिनों में पढ़ी थी. 

8 टिप्‍पणियां:

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

यह कविता पढ़ी नहीं थी लेकिन पढ़ते ही एक और ब्लॉगर और उनकी प्रेरणा महादेवी वर्मा जी की तरफ़ ध्यान गया था।
प्रेरक कविता पढ़वाने के लिये आभार।

Rakesh Kumar ने कहा…

मैंने भी अपने स्कूल के दिनों में यह कविता पढ़ी थी.मन को बहुत अच्छी और प्रेरक लगती थी.
आपने इसे प्रस्तुत कर बीते दिनों कि याद दिला दी.

musafir ने कहा…

अपने स्कूल के दिनों में मैंने पढ़ी थी.इसे यहाँ पढ़कर अच्छा लगा.
इसके लिये आभार.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

महादेवी वर्मा जी की कविता प्रस्तुत कर ने के लिये आभार।

veerubhai ने कहा…

ये आवाहन करती गुनगुनाहट पढवाने के लिए आभार आपका .

Bhushan ने कहा…

आभार आपका. महादेवी ने जितना लिखा बहुत उमदा लिखा.

अभिषेक मिश्र ने कहा…

यह रचना साझी करने का आभार.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी और प्रेरक कविता प्रस्तुत कर ने के लिये आभार।